जीवनी और करियर का अवलोकन
मुलायम सिंह यादव (22 नवंबर 1939 – 10 अक्टूबर 2022) उत्तर भारत के सबसे प्रभावशाली और दीर्घकालीन राजनेताओं में से एक थे, और समाजवादी पार्टी के संस्थापक थे — उसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के यादव, मुस्लिम और व्यापक पिछड़े वर्ग के वोट को एक टिकाऊ चुनावी शक्ति में बदल दिया। शिक्षा और वृत्ति से एक स्कूल शिक्षक और सहजता से एक किसान-नेता, वे लाखों लोगों के लिए सम्मानसूचक 'नेता जी' (नेता) नाम से जाने जाते थे और अपने कार्यकर्ता-वर्ग के लिए एक ऐसे राजनीतिक वंश के अविवादित मुखिया थे, जिसे अब उनका पुत्र अखिलेश यादव आगे ले जा रहा है। उन्होंने भारत के सबसे शक्तिशाली राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में तीन अलग-अलग कार्यकाल पूरे किए और केंद्रीय रक्षा मंत्रालय संभाला, और उनका पाँच दशकों का सफ़र इस कहानी से अलग नहीं किया जा सकता कि यादव समुदाय — संख्या में बड़ा पर सामाजिक रूप से हीन माना जाने वाला — कैसे हिंदी हृदयभूमि में सत्ता हथियारने तक पहुँचा। यह प्रोफ़ाइल सार्वजनिक रिकॉर्ड को नामित, तिथि-युक्त स्रोतों से प्रस्तुत करती है।
प्रारंभिक जीवन: सैफई के एक ग्रामीण स्कूल-अध्यापक
मुलायम का जन्म 22 नवंबर 1939 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एटा जिले के सैफई गाँव में, यादव (पशुपालन/पिछड़ा-जाति) समुदाय के एक कृषक परिवार में हुआ। उन्होंने स्थानीय स्तर पर शिक्षा ली — एटा के इंटर कॉलेज और बाद में आगरा कॉलेज, जहाँ से राजनीति विषय में डिग्री ली — और अपने कार्यजीवन की शुरुआत स्कूल शिक्षक और व्याख्याता के रूप में की; यह व्यावसायिक पहचान उन्होंने कथन-शैली में कभी पूरी तरह नहीं छोड़ी: उनका सरल, कक्षा-जैसा शुद्ध हिंदी और राजनीति को "वंचितों" और वर्चस्वशाली वर्ग के बीच नैतिक पाठ की तरह समझाने की वह आदत, सब एक शिक्षक की देन थी। यह ग्रामीण, शैक्षणिक आरंभ उन्हें कांग्रेस काल के अंग्रेज़ी-बोली, वंशवादी राजनेताओं से अलग करता था और उनके जन-आकर्षण की नींव बना। उन्होंने मधवी यादव से विवाह किया, और उस परिवार के सदस्य — पुत्र अखिलेश, पुत्र प्रतीक और पुत्री शीतल — बाद में सब सार्वजनिक जीवन में खिंचे चले आए।
राजनीति में प्रवेश: लोक दल से जनता उथल-पुथल तक
मुलायम ने 1960–70 के दशक में चरण सिंह के भारतीय लोक दल की समाजवादी, किसान-अभिविन्यस्त परंपरा में राजनीति में कदम रखा — पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश को झकझोरने वाली भूमिगत-विरोधी, कांग्रेस-विरोधी और पिछड़ा-जाति आंदोलन की लहर पर सवार होते हुए। वे उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और 1970 के दशक की उथल-पुथलपूर्ण विपक्षी राजनीति में ऊपर उठे; 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस को अल्पकालिक रूप से सत्ता से बेदखल करने वाली जनता परीक्षा से उनके जुड़ाव रहे। जब जनता परिवार बँटा, वे जनता दल में रहे और 1980 के उत्तरार्ध में एक राष्ट्रीय चेहरा बने। उन्होंने पहली बार वी. पी. सिंह की सरकार में केंद्रीय रेल मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में प्रवेश किया और फिर वी. पी. सिंह तथा चंद्रशेखर की सरकारों (1989–1991) में रक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया।
रक्षा मंत्री और राम जन्मभूमि की कसौटी
राम जन्मभूमि आंदोलन के उग्रतम मोड़ पर रक्षा मंत्री होते हुए, मुलायम उस काल की सबसे आवेगमय घटनाओं के केंद्र में रहे। सितंबर 1990 में, जब तत्कालीन भाजपा नेता लाल कृष्ण एडवाणी की रथयात्रा और कर-सेवकों की गतिविधि अयोध्या के विवादित स्थल को लेकर खतरे का कारण बनी, तो उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कर-सेवकों पर गोली चलाई, जिसमें कई मारे गए — इस घटना में मुलायम, जो समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष रक्षा मंत्री के रूप में ज़िद कर रहे थे कि सरकार आंदोलन के सामने नहीं झुकेगी, हिंदू-राष्ट्रवादी आक्रोश के लक्ष्य और अपने धर्मनिरपेक्ष-पिछड़ा वोट-बैंक के नायक बन गए। वह रवैया — और दिसंबर 1992 में भिन्न राज्य-सरकार के दौरान मस्जिद गिराए जाने के बाद उसके प्रतिक्रिया-प्रबंध के उनके प्रयास — ने उन्हें वह छवि दी जो साम्प्रदायिक दक्षिण के दबाव में नहीं झुकता, और उनके पूरे करियर में उनके वोट-गणित को मुस्लिम और पिछड़ा-जाति मतदाताओं के चारों ओर कसता गया।
समाजवादी पार्टी के संस्थापक (1992)
जब यूनाइटेड फ़्रंट की गिरावट के बाद जनता दल बँटा, तो मुलायम अपने धड़े के साथ 4 अप्रैल 1992 को समाजवादी पार्टी की स्थापना करने वाले बने — एक समाजवादी, पिछड़ा-वर्गीय, धर्मनिरपेक्ष मंच, जिसकी नींव "मंडल" (सामाजिक न्याय) की राजनीति थी: पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों का वह गठबंधन जो ऊपरी-जाति और कांग्रेस वर्चस्व के विरुद्ध खड़ा था। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में यादव राजनीतिक उथान का संस्थागत वाहन बन गई — बिहार में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल जो कर रही थी, उसी का सबसे बड़े राज्य में प्रतिरूप। इसकी कार्यकर्ता-संस्कृति खुले तौर पर जाति-गणित पर आधारित थी और अक्सर बदमाशों को सहन करने वाली थी, पर इसका सामाजिक सार — "पिट्ठू" (आम आदमी) को आत्मसम्मान और राज्य-सत्ता देना — वास्तविक था, और इसी लिए "यादव" उपनाम स्वयं चुनावी दृष्टि से शक्तिशाली हो गया। यह कड़वी-मीठी कहानी यादव समुदाय के विस्तृत इतिहास का राजनीतिक अध्याय है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री: तीन कार्यकाल
मुलायम ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में तीन बार कार्य किया। उनका पहला कार्यकाल (1994–1995) छोटा और तूफ़ानी था, जो बहजन समाज पार्टी के उत्थान और केंद्र के हस्तक्षेप से समाप्त हुआ। वे अक्टूबर 2003 से मई 2007 की पूर्ण पाँच-वर्षीय अवधि में लौटे — एक ऐसी सरकार जो एक ओर लोकप्रियता के लिए याद की जाती है (मुफ़्त या अनुदानित बिजली और आक्रामक ग्रामीण संपर्क) और दूसरी ओर कानून-व्यवस्था के उस रिकॉर्ड के लिए जिसे आलोचकों ने "जंगल राज" कहा; समाजवादी पार्टी पर अपने कार्यकर्ताओं को संरक्षण देने और अपराध के प्रति नरमी का आरोप लगा — और अपने आप में विवादित बयान, जैसे अपने समर्थकों के विरुद्ध मामले दर्ज कराने में उनकी कथित अनिच्छा, उस कार्यकाल की परिभाषक बहस बन गए। वे मार्च 2012 में तीसरी बार लौटे, इस बार सत्ता का दैनिक मोर्चा अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंपते हुए, जबकि वे स्वयं पार्टी के परम निर्णायक रहे — वह उत्तराधिकार-चुनाव उन्हें सत्तर के दशक में भी राज्य की राजनीति का सर्वशक्तिमान व्यक्ति बनाए रखता था, जब तक 2017 में समाजवादी पार्टी की हार नहीं हुई।
उत्तर वर्ष, उत्तराधिकार-संघर्ष और मृत्यु
मुलायम का अंतिम दशक एक परिवार-मुखिया बने रहने और कार्यशील नेता बने रहने के तनाव से चिह्नित रहा। उन्होंने 2014 की लोक सभा तूफ़ान में पार्टी का नेतृत्व किया (जब भाजपा की लहर में पार्टी लगभग समाप्त हो गई), और 2017 में विधान सभा हार के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने ही समर्थकों से क्षमा माँगी, और एक अल्पकालिक मयावती-नेतृत्व बसपा-गठबंधन की ओर झुके — जिसने पार्टी को बाँट दिया। 2021–2022 में, अब अस्सी के दशक में और स्वास्थ्य टूटते हुए, उन्होंने अपने ही परिवार के नेतृत्व के विरुद्र बिगाड़ा — अखिलेश को पार्टी अध्यक्ष से हटाकर प्रत्यक्ष नियंत्रण वापस पाने का प्रयास किया — जिससे समाजवादी पार्टी विभाजन हुआ, जिसमें निर्वाचन आयोग ने पार्टी नाम और चिह्न (साइकल) अखिलेश के धड़े को दे दिया, जबकि मुलायम के अनुयायियों ने भिन्न चिह्न के साथ "पुरानी" समाजवादी पार्टी बनाए रखी। यह खुला पिता-वंश विद्रोह व्यापक और सहृदयतापूर्वक रिपोर्ट हुआ, एक युग के राजनीतिक अंत के रूप में। मुलायम सिंह यादव का निधन 10 अक्टूबर 2022 को हरियाणा के गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में, 82 वर्ष की आयु में हुआ। उनका अंतिम संस्कार पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ हुआ, और उनकी समाधि सैफई में है — उसी गाँव में, जहाँ से उनकी शुरुआत हुई थी।
वे इस अभिलेखागार के लिए क्यों मायने रखते हैं
अगर सूर्यकुमार यादव और कुलदीप यादव यादव नाम को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट तक ले जाते हैं, तो मुलायम सिंह यादव ही हैं — लालू प्रसाद यादव के साथ — जिन्होंने "यादव" को वह शब्द बनाया जो भारत में सरकारें हिलाता है। उनका करियर उस समुदाय के उत्तर प्रदेश में राजनीतिक आत्मउत्थान का नमूना है — भले के लिए भी (सामाजिक न्याय, पिछड़ा-वर्ग की गरिमा, वह साइकल जो 2012 और 2022 में उनके पुत्र के नेतृत्व में सत्ता लौटाई) और बुरे के लिए भी (जाति-ध्रुवीकरण, बदमाश-सहिष्णुता और उनके मध्य-कार्यकाल की कानून-व्यवस्था विफलताएँ)। यह अभिलेखागार पूरे रिकॉर्ड को स्रोतों के साथ दर्ज करता है, स्तुति-काव्य या व्यंग्य-चित्र के बिना; यह प्रोफ़ाइल राजनेता-संग्रह और विशिष्ट यादव हस्तियों के सत्यापित मार्गदर्शिका का हिस्सा है।
यह प्रोफ़ाइल कैसे सत्यापित की गई
जन्म और मृत्यु की तिथियाँ, धारित पद, मुख्यमंत्री के कार्यकाल, समाजवादी पार्टी की स्थापना और पारिवारिक संबंध — इन सबका मिलान राष्ट्रीय और संसदीय अभिलेखों, स्वतंत्र अख़बारों की श्रद्धांजलि-रिपोर्टिंग और निर्वाचन आयोग के परिणामों से किया गया। विवादित चित्रण — 1990 की गोलीबारी, 2003–2007 के "जंगल राज" की आलोचना, और 2022 का पार्टी विभाजन — प्रतिद्वंद्वी दावों के रूप में, उनके स्रोतों को आरोपित करते हुए रिपोर्ट किए गए हैं, न कि किसी निर्णय के रूप में। हमारा निरंतर तृतीय-पक्ष क्रॉस-चेक अंग्रेज़ी विकिपीडिया का "मुलायम सिंह यादव" लेख है; कार्यात्मक तथ्य मौलिक प्राथमिक रिकॉर्ड से लिए गए हैं। त्रुटि होने पर सुधार नीति के तहत उसे ठीक कराने का मार्ग उपलब्ध है।